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ये ख्वाब—-? – गुरुदीन वर्मा

 

ये ख्वाब,

जिनको देखती हैं आँखें,

हर दिल जानता है,

कि ये बड़ी बेदर्दी है,

क्या कुछ नहीं करता इंसान,

अपने इन ख्वाबों के लिए,

जिनमें देखता है वह,

खुद को खुश और आबाद।

 

बस यही ख्वाब वह देखता है,

और इनको पूरा करने के लिए,

वह खुद को बना लेता है,

एक अस्थि पंजर,

दास ख्वाबों का,

हर कुर्बानी वह देता है,

भूल जाता है वह नींद लेना भी।

 

उसको तो महकाना होता है,

अपने ख्वाबों का चमन,

वह बर्बाद हो जाता है,

उसको आबाद करना होता है,

अपना ख्वाब,

वह दांव पर लगा देता है,

अपना सब कुछ,

उसको तो जीतनी है ख्वाबों की दौड़।

 

हर कोई चाहता है,

अपना मुकम्मल ख्वाब,

चाहे वह गरीब हो या अमीर,

चाहे वह यतीम हो या सम्राट,

वह संघर्ष करता है,

अपने ख्वाबों के लिए,

और सितम भी वह सहता है,

अपने ख्वाबों के लिए,

ये ख्वाब,

जिनको देखती है आँखें।

– गुरुदीन वर्मा आज़ाद

तहसील एवं जिला-बारां (राजस्थान)

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