मुहब्बत ने मुझे दुनिया से बेगाना बनाया है ।
ज़िगर का दर्द मैंने रोज पैमाना बनाया है ।
गवाही दे रहे हैं फूल, तितली, और भँवरे भी ,
चमन को खुद चमन वालों ने वीराना बनाया है ।
सितम ढाते रहे हैं लोग उसकी बेजुबानी पर ,
इसी हालात ने वो शख़्स दीवाना बनाया है ।
बिलावल था कभी मैं, लोग अब मयनोश कहते हैं ,
इसी अंदाज़ का यारों ने अफ़साना बनाया है ।
भरी महफ़िल में मुझसे बात क्या की उस हसीना ने ,
मुझे मयकश कहा है ,उसको मयखाना बनाया है ।
अमीरी से बहुत मिलते हैं लक्षण बेज़मीरी के ,
अना को मार कर उसने ये काशाना बनाया है ।
नए अंदाज़ में बनने लगी हैं कोठियां ‘हलधर’,
रसोई से सटा उसने गुसलखाना बनाया है ।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून