मनोरंजन

मेरी कलम से – रुचि मित्तल

 

उनसे न पूछिए मज़ा बारिश की बूँद का,

छप्पर तलक़ नसीब न जिनको कभी हुआ।

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छोटी सी है तमन्ना दिले बेकरार की,

आँसू मैं तेरी आँख के सारे खरीद लूँ।

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दुनिया की दौलतों से मिलेगी वफ़ा नहीं,

बाज़ार में पैसा लिए बैठे रहोगे तुम।

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बोलना आदत तुम्हारी थी सदा से

लब मेरे मज़बूरियाँ खुलवा रही हैं।

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आँसुओं की कद्र करना सीख लो

गम के सागर में उतरना सीख लो

जिंदगी से इश्क़ है तुमको अगर

हर कदम पर यार मरना सीख लो।

©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा

 

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