मनोरंजन

मेघ – रश्मि मृदुलिका

लगता है ये मेघ मेरी तरह है,

कभी बेमौसमी उमड़ते है,

जैसे मेरे मन के भाव हो,

कभी टपकते है धीमे- धीमे,

ओस की ठंडी बूंदें बनकर,

जैसे आंखों के कोर से,

छलके हो अश्रु बनकर,

कभी घुमड़ पड़ते हैं,

जैसे स्मृतियाँ बरस रही हो,

कभी सिर्फ शोर करते हैं, जैसे,

मेरे हृदय के अल्फ़ाज़ हो,

और कभी आकाश की बाहों में,

खामोश सोये रहते हैं,

जैसे तेरे लिए मेरे अनुरागी स्वप्न हो,

– रश्मि मृदुलिका, देहरादून

Related posts

श्रीराम – विनोद निराश

newsadmin

अनुपम रूप तुम्हारा- भूपेन्द्र राघव

newsadmin

पांच दिन दस दिन – राजेश कुमार झा

newsadmin

Leave a Comment