neerajtimes.com – जिसकी अपनी कोई इज़्ज़त नहीं, वह दूसरों के मान अपमान को भला क्या समझे। सार्वजनिक क्षेत्र में अक्सर ऐसे प्रसंग घटित होते रहते हैं। जब बिना किसी कारण के लोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालते रहते हैं। अपशब्द कहना और बात बेबात गालियां देना फैशन बन गया है। यूँ तो किसी ने किसी को गाली दी। किसी पर कोई फर्क नही पड़ा। राह चलते कोई परेशान आत्मा क्यों किसी को गाली दे रही है? इससे किसी को भला कैसा सरोकार। सच तो यह है कि बेशर्म चिकने घड़े अपने आप को शब्दों की मर्यादा में रख नहीं पाते। यूँ भी कह सकते हैं, कि जिन्हें शब्दों के गरिमा के अनुकूल भावों का ज्ञान होगा, वही तो शब्दों की महत्ता को समझेंगे । जिन्हें येन केन प्रकारेण किसी राजनीतिक दल में कोई ओहदा मिल गया हो, वे ओहदे की मर्यादा ही नही जानते, तो शब्दों की मर्यादा भला कैसे जानेंगे । सार्वजनिक क्षेत्र में नेताओं की हालत किसी से छिपी नही है। स्थिति इतनी विकट है कि यदि उन्हें नित्य ही मीडिया में अच्छी कवरेज नहीं मिलती, तब वे पगला जाते हैं तथा महसूस करने लगते हैं कि वे सियासत की गलियों में गुम होते जा रहे हैं । उनके सम्मुख पहचान बनाए और बचाए रखने का संकट उपस्थित हो चुका है, उपेक्षित नेता के लिए यह स्थिति जीवन मरण का प्रश्न बन जाती है। जो उन्हें अनर्गल बयानबाजी करने के लिए विवश कर देती है। मसलन एक सज्जन ने रण भूमि में शौर्य का प्रदर्शन करने वाली वीरांगना पर ही सवाल खड़े कर दिए। उसकी निष्ठा पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। दूसरे खिसियाए हुए सज्जन भी भला क्यों पीछे रहते । वे पहले सज्जन से भी दो कदम आगे निकल गए। किसी वीरांगना को उसकी जातीय पहचान बताकर कमतर आंकने पर उतारू हो गए। उसके प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग कर दिया, जो आपराधिक श्रेणी में आते हैं।
बहरहाल जब से सोशल मीडिया प्रभाव में आया है, तब से सस्ती लोकप्रियता के लिए बंदा किसी भी अपशब्द बोलने या किसी असामाजिक कृत्य का प्रदर्शन करने पर शर्मिंदा नहीं होता। कुछ नमूने ऐसे भी होते हैं, जो किसी खिलाड़ी के खेलों में प्रदर्शन को लेकर उस खिलाड़ी को ही अपनी संकीर्णता के पिटारे में बंद करने पर आमादा हो जाते हैं। खिलाड़ी के कौशल की प्रशंसा न करके उसे अपनी जाति के प्रतिनिधि तक ही सीमित कर देते हैं। खिलाड़ी तो खिलाड़ी, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायिक अधिकारी का सरनेम देखकर ही बल्लियों उछलने लगते हैं कि उनकी बिरादरी का प्रतिनिधि ख़ास कुर्सी पर विराजमान हो गया है। अपने एक पत्रकार मित्र हैं, अपनी जाति के प्रति लगाव इतना अधिक है, कि जैसे ही उन्हें भनक लगती है, कि उनकी बिरादरी के किसी भी सदस्य ने कोई उपलब्धि प्राप्त की है, तो वह उसका प्रचार सगर्व करते हैं। इसी प्रकार किसी खिलाड़ी की उपलब्धि को बिरादरी की उपलब्धि बताकर ऐसा जताते हैं, कि जैसे उसे और उसके कौशल को किसी ने काल कोठरी में बंद कर के रखा हो। उसे उसकी इच्छानुसार अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर न प्रदान किया गया हो ।
विचित्र स्थिति है,चुनाव हारो तो इल्ज़ाम व्यवस्था पर लगा दो, फेल हो जाओ तो परीक्षक को दोषी ठहराओ कि परीक्षक ने परीक्षार्थी के भाव नहीं समझे, परीक्षार्थी के ज्ञान को समझा ही नहीं। बहुत से बड़बोले अपने आप पर इतना विश्वास करते हैं कि वे कुछ भी बोलना अपना अधिकार समझते हैं। वे जानते हैं कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर है। वह व्यक्तिगत दुर्भावना को सम्मान नहीं देती। ऐसे नमूने चर्चा में रहने के लिए किसी भी रूप में सार्वजनिक क्षेत्रों में भ्रमण करते देखे जा सकते हैं। ये नमूने मासूम सरीखा व्यवहार करके उछल कूद इसलिए मचाते हैं , ताकि कोई इनकी ओर ध्यान दे। स्थिति विचित्र है । यदि कोई इनके कृत्यों और इनके वचनों पर क्रुद्ध होकर इनके विरुद्ध खड़ा होता है, तो ये तुरंत गिरगिट की तरह रंग बदलने में ही अपनी भलाई समझकर क्षमा दान माँगने लगते हैं । ऐसे नमूनों से कैसे निपटना चाहिए। यह लम्बी बहस का विषय है। फिर भी ऐसे नमूनों की मानसिक विकृति का उपचार किसी मानसिक रोग विशेषज्ञ के माध्यम से कराए जाने की सिफारिश तो की ही जा सकती है। (विनायक फीचर्स)
previous post
next post