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बेमिसाल ज़िंदगी – अंजू लता

विवेक जागता रहे,तो बेमिसाल ज़िंदगी-

मधुरिम वाणी सदा कराती है बंदगी,

समय के उच्च भाल पर अंकित नसीब हैं-

दिव्य सोच त्यागती विचारों की गंदगी.

 

मयंक भूप रात का,तमस के विनाश का-

सौंदर्य दिवस में भरा प्राची के प्रकाश का,

देव,ऋषि-मुनियों का मिलता वरदान उन्हें-

कर्मवीर होकर जो साथ लें विश्वास का.

 

अंजाना होता है भवितव्य अनदेखा-

वक्त सख़्त हरदम ही,कहे जीवन-रेखा,

राज है सुखों का बस बेबाक़ मुस्काओ-

क्या होगा कब जाने, किसी ने न देखा.

 

पीर के पहाड़ को ठेलना ही बेहतर-

आस्था,विश्वास प्रभु पर रहे निरंतर,

मान बड़ों का करें,छोटों को नेह दें-

विराजेंगे सदा हरेक दिल के अंदर.

 

याद रहे ज़िंदगी के होते चार दिन-

सुख से नहीं बीत सकें अपनों के बिन,

परस्पर मिलकर रहो बैरी न बनो-

विधाता गिन रहा तेरे हरेक पल-छिन.

–  डा. अंजु लता सिंह गहलौत, नई दिल्ली

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