मनोरंजन

कविता – सन्तोषी दीक्षित

भावों की स्याही में डुबोकर,

कागज पर है कलम चलाई।

अक्षर अक्षर जोड़ के हमने,

शब्दों की इक माला बनाई।

उसमें पिरोये प्रेम के मोती,

धवल चांदनी उनको धोती।

संवेदना का धागा लगाया,

तब जाकर कविता बन पाई।

– सन्तोषी दीक्षित देहरादून, उत्तराखंड

Related posts

संध्या सुंदरी उतरी नभ से – जया मीना

newsadmin

राजनीति में युवाओं की भागीदारी की आवश्यकता– डॉ सत्यवान सौरभ

newsadmin

उज्जैन में विराजित हैं विक्रमादित्य की राजलक्ष्मी के रुप में प्रसिद्ध दुर्लभ और अद्वितीय गजलक्ष्मी – देशना जैन

newsadmin

Leave a Comment