आई अंगना में उतरल हए चान ,
देखके बुढ़बो के मन भेल जुआन ।
हिनकर मुंह हए चानो से सुंदर
हिनका छवि से लजाइअ पुरंदर
हए नऽ कोनो हिनका समान ।
आई अंगना में उतरल हए चान।
देह हिनकर महमह करइअ
चलइत हतन हिन तऽ हवा गमकइअ
आई चमेली के गंध भेल पुरान ।
आई अंगना में उतरल हए चान।
हिनकर टीका ऐना चमकइअ
बादल में जेना बिजली दमकइअ
ई लेइत हए विरहिनिया के जान ।
आई अंगना में उतरल हए चान।
हिनकर वाली ऐना झुलइअ
कली के जेना भौरा चूमइअ
एकर हए हुनका बड़का गुमान ।
आई अंगना में उतरल हए चान।
हिनकर डांर ऐना लचकइअ
जेना पोखरी मे कमल डोलइअ
हिन आई बुढ़बो के ले लेथिन जान ।
आई अंगना में उतरल हए चान।
© उदय नारायण सिंह, मुजफ्फरपुर
(विश्व के प्रथम गणतंत्र बृज्जिसंघ ( बज्जिकांचल) की भाषा बज्जिका में आज शरद- कौमदी पर सादर भेंट हैं मेरा बज्जिका गीत -‘ आई अंगना में उतरल हए चान )