अयोध्या नगरी में बाजे बधइया,
कौशिल्या गोद में राम लला अइथिन।
दशरथ नंदन, मर्यादा के मूरत,
राम नाम से पावन होवे सूरत।
जनकपुर में धनुषवा तोड़लक,
सीता मैया के मनवा मोड़लक।
बाप के बचनिया खातिर राजवा छोड़लक,
चौदह बरस बन में दिनवा बीतौलक।
भाई भरत खातिर दिल में माया,
भाई लक्ष्मण संग बन में छाया।
केवट के नैया से गंगा पार भेल,
शबरी के बेर खा के धन्य भेल।
रावण के घमंडवा चूर-चूर करलक,
सीता के लेके अयोध्या वापिस अयलक।
मगह के माटी यही पुकारे,
राम से बड़के कोई न सहारे।
– डॉ अनमोल कुमार, मोकामा, पटना, बिहार