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मेरी कलम से  – डॉ. प्रियंका सौरभ

हर अपना अपना नहीं, भ्रम में रहना छोड़ ।

समय पड़े तो देखिए, कौन निभाता जोड़ ।।

 

रावण को विश्वास था, कुल है पूरा साथ ।

सत्य सामने आ गया, छूट गए सब हाथ ।।

 

कुंभकर्ण ने साथ दे, निभाया भ्रातृ धर्म ।

सच का स्वर दबा रहा, अधूरा रहा कर्म ।।

 

सत्य विभीषण ने कहा, सह न सका अन्याय ।

अपनों ने ही त्याग कर, दी उसको तब हाय ।।

 

साथ खड़ा होना नहीं, बस रिश्ते की बात ।

गलत राह से रोक दे, वह है सच्चा साथ ।।

 

गलती पर जो मौन रह, कैसा उसका नेह ।

पास रहे सच ना कहे, मन में कैसी हेय।।

 

परिवार वही आईना, दिखला दे सच रूप ।

गिरने से ही थाम ले, दूर करे हर कूप ।।

 

सुख में तो सब साथ हैं, दुख में मिले न मीत।

जो विपदा में साथ दे, समझो सच्ची प्रीत।।

 

भटके पथ पर रोककर, जो दिखला दे राह ।

वही सगा कहलाएगा, वह है सच्ची चाह ।।

 

रिश्ते केवल रक्त के, होते नहीं महान ।

सत्य, विश्वास प्रेम से, बनता सच्चा मान ।।

 

समय सभी को परखता, खुल जाता व्यवहार ।

कौन पराया, कौन सँग, होता साफ विचार ।।

 

अंत समय बस यह समझ, जीवन का निष्कर्ष ।

हर अपना अपना नहीं, सच्चा  दुर्लभ हर्ष ।

-डॉ. प्रियंका सौरभ, उब्बा भवन, आर्यनगर,

हिसार (हरियाणा) – 125005, मोबाइल: 7015375570

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