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हलधर के दोहे:- जसवीर सिंह हलधर 

1-चिंतन में दिखता नहीं ,कवियों के ठहराव ।

लुप्त हुई संवेदना, मन में कटुता भाव।।

 

2- सैफ करीना देख लो ,कितने हैं मगरूर ।

बेटे को शैतान का ,नाम दिया तैमूर ।।

 

3- आज हिंद के सामने, प्रश्न खड़े विकराल ।

मज़हब के उन्माद में, होता रोज बवाल ।।

 

4- दशकों तक देते रहे ,संविधान को घाव ।

खाते हैं सौगंध वो ,करना हमें बचाव ।।

 

5- आतंकों के मूल में , इस्लामी आयाम ।

मानवता को खा रहे , तर्क रहित पैगाम ।।

 

6- रोगी जड़ सूखा तना, शुष्क हुई है छाल ।

मज़हब की दीमक लगी , दुनिया का वो हाल ।।

 

7- अपराधी नेता हुए, नैतिकता है लुप्त ।

संसद दिखती मौन है , न्यायालय भी सुप्त ।।

 

8- भाई चारे का यहां,बदल रहा आधार ।

शोणित से छपने लगे, दुनिया में अख़बार ।।

 

9- क्या इसका आरंभ है ,क्या है इसका अंत ।

ओर छोर मिलता नहीं, माया ईश अनंत ।।

 

10- नंगापन होने लगा,दुनिया में मशहूर।

आंखों का पर्दा फटा , दर्पण चकनाचूर ।।

 

11- भाषा युग संजीवनी , भाषा काल चरित्र ।

खिंचते हैं साहित्य में , शब्द ब्रह्म के चित्र ।।

जसवीर सिंह हलधर , देहरादून

 

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