जय हो विश्वकर्मा बाबा, जय हो शिल्पकार,
तुमने ही रचा है ये सारा संसार।
हाथ में हथौड़ा, माप का है पैमाना,
तुम्हारे ही हुनर से चलता है जमाना।
देवों के महल तुमने ही बनाए,
अस्त्र-शस्त्र भी तुमने ही सजाए।
लोहार, बढ़ई, सब तुम्हें ध्याते,
इंजीनियर भी शीश तुम्हें नवाते।
मशीनों में बसे हो, औजारों में वास,
तुम्ही से चलता है उद्योग का हर सांस।
17 सितंबर को पूजा होती भारी,
मजदूर-कलाकार सब करें तैयारी।
हे प्रभु, हुनर में दो ऐसी धार,
काम बने पूजा, जीवन बने त्योहार।
– डॉ अनमोल कुमार, मोकामा, पटना, बिहार