मनोरंजन

ग़ज़ल – विनोद निराश

हर नसीब में वफ़ा नहीं होता,

हर इंसां को ये पता नहीं होता।

 

अच्छे-बुरे सभी इस जहां में,

हर कोई बेवफा नहीं होता।

 

हर बावफ़ा के साथ हो वफ़ा,

ऐसा भी हर दफा नहीं होता।

 

बेखुदी में उन्हें रब कह दिया,

पर इंसां तो खुदा नहीं होता।

 

भला दो लफ़ज़ ही तो कहे थे,

ऐसे तो कोई ख़फ़ा नहीं होता।

 

उम्र सारी गुजरी ये सोचते-सोचते,

बुरा नसीब हर दफा नहीं होता।

 

कौन मिले कौन बिछुड़े यहाँ पे

किसी को कुछ पता नहीं होता।

 

खुशगवार होती निराश ज़िंदगी,

गर वो बेखबर हुआ नहीं होता।

– विनोद निराश, देहरादून

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