मनोरंजन

ग़ज़ल – रीता गुलाटी

ऩाच़ते गात़े हैं सब य़ाऱो के बीच़,

खुश़ ब़ड़ा होते है बौछारों के बीच़।

 

ज़िद़गी ग़ुज़री है फनकारों के बीच़,

रात दिन हम छपते अख़बारों के बीच़।

 

डूबती मैं रात दिन अग़्यारों के बीच,

फूल भी खिलते रहे ख़ारों के बीच।

 

दर्द से गुज़रे है हर लम्हा मेरा,

वक्त बीता आज़ ग़म-ख़्वारों के बीच़।

 

बीत़त़ा हर पल मेरा इंतजार मे,

नाम़ रख ले अब तो बेच़ारो के बीच़।

 

नौक़ऱी म़े अब ज़लालत थी मिली,

वक्त ग़ुज़ऱा यार ऩाक़ाऱो के बीच़।

 

क़ाम़ मनमाफिक कहां हमको मिला,

मैं खड़ा हूँ आज ह़क़दारो के बीच।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़

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