(1)”मि”, मिथ्या हैं मेरे सारे वो पाप
जो हुए यहां जाने अनजाने में !
कर दीजिए दिल से मुझे माफ…..,
और लगा लीजिए अब आप गले !!
(2)”च् “, च्युप मुख श्रांत तन मन जीवन से
हूँ सदैव आपसे क्षमा प्रार्थी !
कर दो बस माफ छोटा समझ के.,
होगी ना आगे से कभी गलती !!
(3)”छा “, छाया है ये तो प्रारब्ध कर्मों की
करना होगा इसका यहां क्षय !
अपनों से अपने मांग रहे क्षमा…..,
अब, बन बड़े लगालो हमें हृदय !!
(4)”मि “, मिटायी जा सकती हैं सभी गलतियां
बस, होना चाहिए मन में पश्चाताप !
सबसे है अर्ज़ और विनती मेरी…..,
कि, करलें समय रहते पापों का नाश !!
(5)”दु “, दुआ करता हूं सभी के लिए प्रभु से
कि, वे बनाए रखें विवेक और बुद्धि !
ताकि, समय रहते सब चेत जाएं…..,
और फिर करते चलें यहां आत्मशुद्धि !!
(6)”क् “, क्लांत दुःखी परेशान होता है मन
जब हमसे हो जाए यहां पे गलती !
और करके प्रतिक्रमण मन ही मन….,
क्षमा याचना की करते हैं हम विनती !!
(7)”क “, करते रहें यदि सदा सत्कर्म यहांपर
और चलें श्रीप्रभु को उन्हें करते अर्पण !
तो, फिर कर्म का नहीं होए है बंधन…..,
और बन जाते सभी कर्म हमारे विकर्म !!
(8)”ड़ “, डगर आसान हुए चले है यहांपर
जब होते नहीं हैं मन में कोई पाप !
और सब अच्छा ही होता जीवन में…..,
जब रखते हैं सभी से हम प्रेम सद्भाव !!
(9)”म “, मन को बनाए चलें सदा निष्कपट
और सबको अंतर्मन से यहां स्वीकारें !
सतत चलें छोड़ते राग द्वेष आसक्ति……,
और अहंकार भावना का त्याग करें !!
(10)”” मिच्छामि दुक्कड़म “”, की पवित्र भावना
सदैव सच्चे ह्रदय से ही उपजती !
इसे चलें अपनाए तन मन से यहां…..,
ये सभी को हर्षाए सरसाए चलती !!
-सुनील गुप्ता (सुनीलानंद), जयपुर, राजस्थान