राह में पड़ता हैं शमशान,
रोज गुजरता हूं पास से ।
देखता हूं चिता के पास,
चिंता में खड़े कुछ लोग ।
कुछ आपस में बात करते ,
कुछ शांत, कुछ फोन पर ।
फिर धीरे धीरे सब जाते,
चिता शांत होने से .पहले ।
हाँ, दो चार लोग दीखते हैं,
चिता के पास मंडराते हुए ।
साधारण से दिखने वाले,
कंधे पर गमछा,या टोपी ।
लगते हैं गाँव से जुड़े रिश्ते ।
दूर हुए हो शहर के अहम में ।
तीसरे दिन भी दिखते वही,
गाँव के साधारण से लोग ।
अस्थियो को सम्हालकर,
राख में से निकालते हुए ।
भावनाओं को दबाकर l
नहीं दिखते आस पास,
शहर के लोग ….
✍ प्रदीप सहारे,नागपुर, महाराष्ट्र
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