परिणीता हूँ प्रिय तेरी, सहज ऋंगार लिखती हूँ,
तुम्हारी बांसुरी बनकर,हृदय उद्गार लिखती हूँ।
तुम्हारे भक्तिरस का पान करके, हूँ मगन कान्हा,
तुम्हारी थी, तुम्हारी हूँ, तुम्हारा प्यार लिखती हूँ।।
ये पागल हवाऐं ये बेइमान मौसम,
ये अंबर की चादर में तारों के मोती।
है वैसे तो सब कुछ मेरे पास लेकिन,
जो तुम पास होते तो क्या बात होती।।
खूबसूरत वादियाँ खामोश सी हैं हवायें,
दे रहीं हैं सदायें… तुम कहाँ … कहाँ हो।
– डाo किरण मिश्रा (स्वयंसिद्धा), नोएडा, उत्तर प्रदेश