ये देश को दीमक बनकर खा रहा है,
ये जड़ को अंदर से खोखला कर रहा है ।
ये कुर्सी पर बैठकर लूट मचा रहा है,
ये फाइलों में नोटों को कूट रहा है ।
यहाँ रिश्वत बिना कोई काम नहीं होता है,
यहाँ पैसे बिना कोई नाम नहीं होता है ।
यहाँ ईमान का कोई दाम नहीं होता है,
यहाँ बेईमान कभी बदनाम नहीं होता है ।
ये नेता की जेब में पलता है,
ये बाबू की मेज के नीचे चलता है ।
ये थाने में वर्दी पहनकर बिकता है,
ये दफ्तर में कलम बनकर लूटता है ।
ये गरीब की थाली से रोटी छीनता है,
ये किसान के गले में फांसी बनता है ।
ये मजदूर के बदन का खून पीता है,
ये बच्चों के भविष्य को चीर देता है ।
ये सड़क कागज पर ही बनाता है,
ये पुल बनने से पहले ही खा जाता है ।
ये नल में पानी नहीं हवा देता है,
ये योजना आते ही निगल जाता है ।
ये अस्पताल में दवा तक बेच देता है,
ये स्कूल में किताब तक खा जाता है ।
ये श्मशान की लकड़ी तक लूट लेता है,
ये कब्र की जमीन तक बेच देता है ।
ये वोट को नोटों से खरीद लेता है,
ये ईमान को दौलत से तोल देता है ।
ये सच को झूठ में बदल देता है,
ये झूठ को सच बनाकर बेच देता है ।
अरे कितना लूटोगे देश को बताओ,
अरे कितना फूंक दोगे ईमान को बताओ ।
जिस दिन ये जनता जाग जाएगी,
तुम कुर्सी छोड़कर भाग जाओगे ।
बहुत हुआ अब देश को बचाना है,
बहुत हुआ अब ईमान को जगाना है ।
भ्रष्ट को अब जेल में डालना है,
तभी जाकर भारत को बचाना है ।
- अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र