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बुज़ुर्गों की दुआ – श्री ठाकुर

ज़िंदगी की राह में जो चराग़ बनकर जलते हैं,
वही बुज़ुर्ग हैं, जो हर अँधेरे में राह दिखाते हैं।

उनकी आँखों में गुज़रे वक़्त की दास्तान रहती है,
उनकी ख़ामोशी में भी कोई गहरी ज़ुबान रहती है।

उनकी बातों में तजुर्बे का फ़लसफ़ा मिलता है,
उनकी दुआओं में सुकून और हौसला मिलता है।

वो रिश्तों की बुनियाद, घर की रौनक होते हैं,
उनके होने से संस्कारों के दीप रोशन होते हैं।

वक़्त चेहरे पर भले ही कुछ निशान छोड़ जाए,
पर उनका किरदार हर पीढ़ी को राह दिखाए।

मेरे दादू हों या हर घर के बुज़ुर्ग प्यारे,
आपसे ही तो रोशन हैं जीवन के ये किनारे।

आपका साया रहे, तो सफ़र आसान लगता है,
आपका आशीष मिले, तो हर सपना मेहरबान लगता है।

आप उम्र नहीं, एक मुकम्मल तजुर्बा हैं,
हमारी तहज़ीब, हमारी विरासत और हमारा भरोसा हैं।
— श्री ठाकुर, देवघर ( झारखंड)

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