मनोरंजन

ग़ज़ल – विनोद निराश

दिल की लगी दिल्लगी बन के रह गई,

अधूरा फ़साना जिन्दगी बन के रह गई।

 

पास रहते कदर न समझी जिसने कभी,

अब वो बात गुजरी घड़ी बन के रह गई।

 

बेख्याली में दामन छुड़ा कर तो चले गए,

और लौट के आना बेबसी बन के रह गई।

 

इक अना क्या आई दरम्यां हमारे- उनके,

तडप इस दिल की बेरुख़ी बन के रह गई।

 

हद से ज्यादा चाहा जिसे हमने उम्र भर,

वो अफ़साना-ए-आशिकी बन के रह गई।

 

रात की तन्हाई में बिस्तर की सिलवटें,

निराश दिल की बेकली बन के रह गई।

– विनोद निराश, देहरादून

फ़साना – बंधन / जंजाल / कल्पित साहित्यिक रचना जैसा

बेख्याली – बिना सोचे समझे

बेबसी – लाचारी / विवशता

अना – अभिमान / घमंड / अहम / अहंकार

दरम्यां – मध्य / बीच

बेरुख़ी – अनदेखा करना / अवसर पड़ने मर मुँह फेर लेना

अफ़साना-ए-आशिकी – प्रेम कहानी / प्रेम का क़िस्सा / प्रणय वृतांत

बेकली – बेचैनी

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