दिन रात खटती हुई
अस्तित्व विहिन स्त्री
चाहती है पुरुषों से
चेहरे पर सुकून
होठों पर मुस्कान और
दिल में इतमिनान
फिर वो चाहे
पिता हो ,भाई हो, पति हो
प्रेमी हो , या फिर बेटा
पाजेब पहनकर आंगन में
जब छम छम चलती है
तो गोद में उठा के
पिता कहे कि
नन्हें नन्हें पांव
थक जायेंगे तुम्हारे
ज्यादा मत चला करो।
रक्षासूत्र बांधते समय
भाई से
उपहार में चाही है अपनी
सुरक्षा का संकल्प
तो प्रेमी के रूप में
निश्छल प्रेम
और पति संग
परिणय में बंध
उम्र भर का साथ
रही पुत्र की बात तो
उससे ढलती
उम्र में सहारा
पर बदलते वक़्त के साथ
ये क्या हो रहा है
पिता ही जान का दुश्मन बन
रह है
भाई दोस्त के साथ
इज़्ज़त पर हाथ डाल रहा है
प्रेमी उसकी बोली लगा रहा है
रही बात पति की
तो पूछो ही मत
जब-तब रह-रह कर
प्रताड़ित कर रहा है
कभी बच्चे के लिए
तो कभी दहेज के लिए
और कभी रूप के लिए
ताने दे रहा है
और रही सही कसर बेटा
बूढ़ी मां को वृद्धाश्रम पहुंचा के
पूरी कर रहा है।
तो ये है पांच अहम रिश्ते
जिसके बीच एक स्त्री
सब कुछ ढूढ़ती है पर
उसे निराशा हाथ लग रही है।
और उसके चेहरे की हंसी
गायब हो रही है
विश्वास डगमगाने के साथ साथ
अकेली पड़ गई है।
– कंचन श्रीवास्तव आरज़ू ,प्रयागराज, उत्तर प्रदेश