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बदल गया इंसान (लघुकथा) – डा. सहदेव बालियान

neerajtimes.com – ज्येष्ठ महीने की चिलकती धूप वाली तेज गर्मी पड़नी शुरू हो गई थी.सुबह शाम क्यारी के पेड़-पौधों की सिंचाई करने से मिट्टी में नमी और ठंडक बनी रहने लगी.

देव के घर के आंगन में बनी क्यारी में लगे घने पत्तों वाले छायादार पेड़ के नीचे,गर्मी से बचने के लिये एक प्यारी सी बिल्ली किट्टी ने अपना ठिकाना बना लिया था। गर्मी से बेहाल होकर एक बंदर भी आकर वहीं आराम फ़रमाने लगा,जहां बिल्ली रोज बैठती थी़

थोड़ी देर बाद जब बिल्ली आई तो बंदर को देखकर वह चुपचाप पोर्च में खड़ी गाड़ी के नीचे बैठ गयी.

शाम होने पर जब बंदर जाने लगा तो बिल्ली की उससे मुलाकात हो गई . दोनों के बीच बड़ी मजेदार और ज्ञानवर्द्धक चर्चा हुई !

बिल्ली ने बंदर से पूछा -तुम मेरी जगह क्यों आये?

बंदर ने कहा -तुम तो जानती हो,कि इस पॉश कॉलोनी में सभ्य और मॉडर्न लोग ही रहते हैं.

लगभग सभी कोठियों के गेट पर चौकीदार तैनात हैं और विभिन्न नस्ल के पालतू विदेशी डॉगी भी हैं.

अगर किसी घर के अंदर जाने की कोशिश करेंगे, तो कोई जैकी या टॉमी हमें घर में घुसने नहीं देगा.

जैसे-जैसे मनुष्य सभ्य होता चला गया, उसकी चालाकी भी बढ़ती गई.उसने कटखने कुत्ते को पालतू बना लिया.

वह मालिक के प्रति वफादारी दिखाते हुए अपने ही साथी जानवरों जैसे बिल्ली ,बंदर, कबूतर,गिलहरी आदि का भी दुश्मन बन बैठा ।

बिल्ली ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा – ठीक कहते हो! शायद इस घर में अभी तक सभ्यता और चालाकी नहीं पहुंची है.

बंदर ने समर्थन करते हुए कहा-“अरे हाँ!कुछ दिन पहले इस घर के गृह स्वामी फलों का थैला लेकर जैसे ही गेट पर आए,मैंने उनके हाथ से थैला झपट लिया, इस पर वह मुस्कुराते हुए कहने लगे -बंदर मामा! लगता है तुम बहुत भूखे हो और इन फलों की तुम्हें हमसे ज्यादा जरूरत है.

वह अपनी पत्नी से यह भी कह रहे थे,कि ” चोर एक जरूरत मंद इंसान होता है ,इंसान भले ही एक बार बगैर जरूरत के चोरी कर ले, लेकिन जानवर ऐसा नहीं करते!

बिल्ली बोली – सही है.बगैर जरूरत के चोरी करने वाले ये तथाकथित सभ्य लोग तो हमसे बड़े चोर हैं!

इस पर बंदर ने गूढ़ रहस्य से पर्दा हटाते हुए कहा

– साधारण चोर और जानवर तो एक जैसे ही होते हैं.वे जरूरतमंद और अभाव ग्रस्त होने के कारण चोरी करते होंगे,लेकिन ये ‘ सभ्य लोग ‘ चोरी कम और हेराफेरी ज्यादा करते हैं.इसका एक रूप ऊपर की कमाई यानि रिश्वतअर्जित करना है.

देव सोच रहे थे,कि बिल्ली और बंदर के प्रभावशाली सामयिक,ज्वलंत,सटीक और बेबाक़ संवाद ,युधिष्ठिर और यक्ष के बीच हुए संवादों से कम ज्ञानवर्द्धक नहीं हैं. इंसान बदल गया है। .

-डा. सहदेव बालियान,ग़ाज़ियाबाद, (उ.प्र.)

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