मनोरंजन

पुस्तकें: राजदार – रेखा मित्तल

काग़ज़ के कुछ पन्नों पर

समाया है भावों का सिंधु

शब्द रूपी बूँदों से

उकेरे है मन के बिंदु

कहीं मन की पीड़ा तुम

कहीं हृदय का प्रेम हो

अनेक युगों को समेटे हुए

वक्त की पहचान हो तुम

पुस्तकें केवल काग़ज़ नहीं

बल्कि रचनाकार का व्यक्तित्व हैं

कहीं उषा की रँगोली हो

कहीं प्रियतम की बोली हो

स्मृतियों को पन्नों में समेटे हुए

रचनाकार की राज़दार हो तुम

गुलाबों की पंँखुड़ियों जैसे

नाजुक एहसासों को संँजोती

बालमन हो या कवि हृदय

सब के भावों को शब्दों में पिरोती

गुजारिश है बस इतनी राजदार हो

मानव मन की राजदार ही रहना।

– रेखा मित्तल, चंडीगढ़

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