कारोबार

अर्श से फर्स पर – श्याम कुंवर भारती

जब मैं था बुलन्दियों मेरे दीवाने सारे जमाने लगे।

आते ही दिन गर्दिशों साथ छोड़ने कई बहाने लगे।

 

आँख दिखाने लगे आज हर छोटे और बड़े मुझे।

जो थे मेरे करीबी सबसे बड़े मुझसे ही कतराने लगे।

 

गुमान था मुझे हरा नहीं सकता कोई कभी भी मुझे।

लगा के नारा श्रीराम का आसानी से मुझे हराने लगे।

 

किया जितना कर्म बुरे राष्ट्र दोह की सीमा तक गया।

किया देश दुश्मनों से प्रेम परिणाम सामने आने लगे।

 

रहा नहीं हमेशा राज किसी का बात भूल बैठा था मैं।

मिल के सभी लोग मेरे सिंहासन के पांव हिलाने लगे।

 

जब तक रहा सत्ता में पत्ता साफ किया देश प्रेमियों का।

उतार के कुर्सी मुझे दो देशों के बीच दीवार बबाने लगे।

 

रिश्ता विश्वास का बनाया नहीं किसी से मैंने कभी ।

बाँटा था जिनको दो वर्गों में अब वो हाथ मिलाने लगे।

 

कटमनी लिए बिना होता नहीं था कोई काम किसी का।

मेरे जाते ही सरकार नई लोगो कट मनी लौटाने लगे।

 

लुटमार बलात्कार भ्रष्टाचार अत्याचार कोई सीमा नहीं।

पीट के अंडे टमाटर चप्पलों हर आम आँखे दिखाने लगे।

 

जिनको समझा था बेकार और बेज़ार अब सहारा उन्हीं का ।

मिलकर साथ उनके निजाम को हराने मंसूबे बनाने लगे।

 

सोचा न था  हाल ऐसा हमारा कुनबा बिखर जाएगा मेरा ।

बना फेहरिस्त मेरे जुर्मों भारती सजा के नाम डराने लगे।

-श्याम कुंवर भारती,बोकारो, झारखंड

 

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