मनोरंजन

तुमसे मिलना – रुचि मित्तल

तुमसे मिलना

कुछ वैसा था

जैसे बरसों से बंद पड़ी किताब में

अचानक

एक सूखा हुआ फूल मिल जाए

जिसकी ख़ुशबू

अब भी काग़ज़ों में सांस ले रही हो

तुम्हारी आवाज़

दरवाज़े पर टंगी उस घंटी जैसी है

जिसे हवा छूती तो है

पर बजाती नहीं

मैंने कई बार सोचा

तुम्हें भूल जाऊँ

फिर याद आया

भूलने के लिए भी

याद करना पड़ता है पहले

तुम्हारा नाम

अब मेरे दिन के

किसी कोने में नहीं रहता

पर रात जब करवट बदलती है

तो तकिये के नीचे

धीरे से मिल जाता है

और मैं…

नींद से आधी जागी हुई

उसे फिर से वहीं रख देती हूँ

जहाँ से तुम कभी गए ही नहीं थे।

-रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

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