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गुरु पूर्णिमा गुरु-तत्त्व, श्रद्धा और कृतज्ञता का पावन पर्व – कविता बिष्ट ‘नेह’

neerajtimes.com – गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
गुरु पूर्णिमा श्रद्धा, समर्पण, कृतज्ञता और आत्मबोध का महापर्व है। यह दिन इसलिए विशेष है कि भारतीय संस्कृति में इसे अपने आध्यात्मिक एवं अकादमिक गुरुओं के प्रति सम्मान, वंदन और कृतज्ञता प्रकट करने के पर्व के रूप में मनाया जाता है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह उत्सव हमारी सनातन परंपरा, संस्कृति और गुरु-शिष्य परंपरा की अनुपम धरोहर है।
भारतीय मान्यता के अनुसार इसी पावन तिथि पर महर्षि वेदव्यास का अवतरण हुआ था। उन्होंने वेदों का संकलन, पुराणों की रचना तथा महाभारत जैसे महान ग्रंथों का प्रणयन कर सम्पूर्ण मानवता को ज्ञान का अमूल्य प्रकाश प्रदान किया। इसी कारण उन्हें ‘आदि गुरु’ के रूप में भी स्मरण किया जाता है और यह दिन ‘व्यास पूर्णिमा’ के नाम से भी प्रसिद्ध है।
मनुष्य के जीवन-निर्माण में गुरु की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। माता-पिता हमें जन्म देते हैं, किंतु गुरु हमारे व्यक्तित्व, विचार, संस्कार और चरित्र का निर्माण करते हैं। वे पुस्तक का ज्ञान जीने की कला, सत्य का मार्ग, कर्तव्य का बोध और मानवता का मूल्य भी सिखाते हैं। गुरु ही अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करते हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर के समकक्ष स्थान दिया गया है।
भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है, “तमसो मा ज्योतिर्गमय”, अर्थात् हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। यह प्रकाश ज्ञान, विवेक और सदाचार का प्रकाश है, जो गुरु के माध्यम से हमारे जीवन में प्रवेश करता है। गुरु पूर्णिमा एक पर्व है, तथा गुरु-तत्त्व के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का अनुपम अवसर है।
पूर्णिमा का अर्थ अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ना, अज्ञान से ज्ञान की ओर अग्रसर होना, संशय से विश्वास तक पहुँचना और आत्मा को सद्ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करना है। जिस प्रकार पूर्णिमा का चंद्रमा अपनी शीतल चाँदनी से संपूर्ण सृष्टि को आलोकित करता है, उसी प्रकार गुरु अपने ज्ञान, स्नेह और मार्गदर्शन से शिष्य के जीवन को प्रकाशमान कर देते हैं।
मेरे जीवन में भी बचपन से आज तक अनेक गुरुओं का स्नेह, मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। सर्वप्रथम मेरे माता-पिता मेरे प्रथम गुरु बने, जिन्होंने मुझे संस्कार दिए और शिक्षा के पथ पर अग्रसर किया। इसके पश्चात जीवन के प्रत्येक चरण में जिन-जिन गुरुजनों का सान्निध्य मिला, उन्होंने मेरी लेखनी, साधना, व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि को समृद्ध बनाया। यदि आज मैं अपने विचारों को शब्द दे पा रही हूँ, तो उसमें मेरे गुरुओं के तप, विश्वास, स्नेह और आशीर्वाद का अमूल्य योगदान है। उनके प्रति मेरा हृदय सदैव श्रद्धा और कृतज्ञता से नतमस्तक रहता है।
पूर्णिमा की चाँदनी को निहारते हुए मुझे सदैव गुरुकृपा की शीतल आभा का अनुभव होता है। जैसे चंद्रमा अंधकारमय रात्रि को प्रकाशित कर देता है, वैसे ही गुरु का ज्ञान जीवन के भय, भ्रम, अज्ञान और निराशा को दूर कर नई दिशा प्रदान करता है। उनकी शिक्षा हमें प्रेम, करुणा, संयम, सत्य, सेवा और सदाचार का मार्ग दिखाती है।
मैं पूर्णिमा को आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना का अवसर मानती हूँ। इस दिन मैं श्रद्धापूर्वक चंद्रमा के दर्शन करती हूँ, उन्हें अर्घ्य अर्पित करती हूँ तथा अपने अंतर्मन के भाव ईश्वर और गुरुचरणों में समर्पित करती हूँ। व्रत रखना मेरे लिए धार्मिक आत्मसंयम, आत्मशुद्धि, पूर्वजों के प्रति श्रद्धा तथा भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी उपवास शरीर को संतुलित रखने और स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने में सहायक माना गया है, किंतु मेरे लिए इसका सबसे बड़ा महत्व आत्मानुशासन और सकारात्मक जीवन-दृष्टि का विकास है।
इस साधना के माध्यम से मैं जड़ और चेतन, प्रकृति और परमात्मा, मन और आत्मा के मधुर संबंध का अनुभव करने का प्रयास करती हूँ। गंगा की पावन धारा, पूर्णिमा की शीतल चाँदनी और गुरु का ज्ञान ये तीनों मेरे लिए जीवन को निर्मल, शांत और प्रकाशमय बनाने वाले दिव्य प्रतीक हैं।
संत कबीरदास ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है—
“गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय॥”
वास्तव में गुरु ही वह सेतु हैं, जो मनुष्य को सत्य, ज्ञान और परमात्मा से जोड़ते हैं। इसलिए गुरु का सम्मान करना, उनके प्रति कृतज्ञ रहना तथा उनके उपदेशों को जीवन में उतारना ही गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश है।
इस पावन अवसर पर मैं अपने जीवन के समस्त गुरुजनों को सादर प्रणाम करती हूँ। जिन्होंने मुझे अक्षरज्ञान दिया, जिन्होंने जीवन का अर्थ समझाया, जिन्होंने मेरी लेखनी को दिशा दी, जिन्होंने कठिन समय में मेरा मार्गदर्शन किया और जिन्होंने मुझे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी मैं उन सभी पूज्य गुरुजनों के श्रीचरणों में अपनी श्रद्धा, भक्ति और कृतज्ञता सादर समर्पित करती हूँ।
गुरुकृपा से नेह-मन शुचि ज्योतिर्मय हो जाए,
ज्ञान का प्रत्येक कण जीवन का व्रत बन जाए।
सरस पूर्णिमा चाँदनी निर्मल रहे यह तन- मन,
गुरुचरणों में झुका शीश, सदा सफल हो जाए॥
— कविता बिष्ट ‘नेह’, देहरादून, उत्तराखंड

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