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मिट्टी से मोहब्बत – डॉ अनमोल कुमार

जब सुबह की धूप आँगन में उतरे,

हाथ में खुरपी, मन में उम्मीद।

एक बीज धरती की कोख में रख दूँ,

फिर देखूँ कैसे फूटे  उम्मीद।

 

मिट्टी से सने ये दोनों हाथ,

पर मन मेरा कुंदन-सा साफ।

गमले में तुलसी, क्यारी में गेंदा,

हर पत्ते पर लिखता जीवन का पाठ।

 

लीची का पेड़ लगाऊँ

आम की बगिया महके बिहार।

शहर के शोर से दूर यहाँ,

मिलता है सुकून बेशुमार।

 

पौधे नहीं ये बच्चे हैं मेरे,

रोज़ इन्हें पानी से नहलाता हूँ।

इनकी हँसी है नई कोंपल,

इनके आँसू सूखे पत्ते पाता हूँ।

 

जब दुनिया दौलत के पीछे भागे,

मैं भागता हूँ खाद-पानी लेने।

क्योंकि बागवानी सिखाती है मुझको –

देना ही असली पाना है जीने।

 

AC की हवा में दम घुटता है,

इन पेड़ों की छाँव में जान है।

जो ऑक्सीजन खरीद रहे बाज़ार से,

मेरी बगिया उनकी दुकान है।

 

आओ एक पौधा लगाएँ हम सब,

धरती का शृंगार करें।

बागवानी सिर्फ शौक नहीं,

ये आने वाली साँसों का व्यापार करें।

– डॉ अनमोल कुमार

मोकामा, पटना, बिहार

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