मनोरंजन

कलयुग का ताण्डव नृत्य – नीलांजना गुप्ता

आज तक देखी थी दूध सी निर्मल धाराएं पृथ्वी पर

किन्तु आश्चर्य!

ये नदियाँ हर गली, हर शहर, घरों में बहती नज़र आती हैं

किन्तु अफ़सोस रंग में फर्क है!

एक उज्ज्वल तो दूसरा सुर्ख है।

यह जल है तो यह ख़ून!

हाँ, यह खून की नदियाँ हैं, इन्सानी खून की।

जो धमनियों की जगह सड़कों पर बहती हैं।

इंसान पीता है तो इंसान के खून को

नहाता है तो इंसान के खून से।

शायद, सृष्टि रचयिता भी आदी हो गए हैं इसके।

कहीँ जल रहीं हैं आग की ज्वालाएँ

सुनाई पड़ रहें हैं बमों के धमाके, गोलियों की गर्जना

जिसके बीच सिमटी खड़ी है मानवता।

पुकार रही है चीख़ चीख़ कर,

दिलों को भेदनें वाली आवाज़ में।

किन्तु अफ़सोस!

उसकी ही प्रतिध्वनि गूँजती है चारो ओर।

इस दावानल ने,

असंख्य देशों, प्रान्तों को लिया है अपनी चपेट में।

बढ़ती ही जा रही है तूफ़ान की तरह चारों ओर।

और कितने भेंट होगें इस बलिवेदी पर,

और कितनी देवियों के उजड़ेगे श्रृंगार।

कितनी माताओं की गोद होंगी सूनी।

और बिछड़ेगा बहनों का पवित्र प्यार।

क्या हो गई है इस प्रजातन्त्र, स्वतन्त्र देश की हालत।

लोग महसूस करते हैं स्वयं को खुले आसमान के नीचे

जो बदल जाएंगे कभी भी राख के एक ढ़ेर में।

कब आएगा स्वराज, कब बनेंगी धरती स्वर्ग?

क्या स्वर्ग का निर्माण मानव राख से होगा?

कब रुकेगा यह नर संहार,’कलयुग का ताण्डव नृत्य

पता नहीं फिर कब पैदा होंगें राम और रहीम।

जो करेगें इन राक्षसों का संहार,

आलोकित करेगें विश्व में दिव्य ज्ञान।

इंतज़ार है उस सुनहले युग का,

जब हँसता, मुस्कराता हर चेहरा नज़र आएगा।

बजेंगी शान्ति व सद्द्भाव की बाँसुरी चारों ओर,

हर मौसम में सावन झूमता नजर आयेगा।

हाँ, मैं देख रही हूं, क्षितिज के उस पार,

दूर अँधेरे को चीरती हुई एक किरण

शायद वही है………….

त्रेतायुग युग का आभास, द्वापरयुग का प्रादुर्भाव,

सतयुग का आगमन!

-नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश

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