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रूमा (लघु कहानी) – जया भराड़े बड़ोदकर

neerajtimes.com – रूमा छोटी सी मासूम थी पांचवीं में पढ़ती थी मम्मी पापा नौकरी में व्यस्त थे । छोटा भाई तीन साल का था सोमू बड़ा प्यारा बस खेलना, खाना और रोना इतना ही उसे आता था। रूमा भी घर में आते ही उसके साथ खेलती रहती। रूमा सुबह ही स्कूल निकल जाती थी दोपहर को घर आ जाती और सोमू के साथ सब कुछ भूल जाती। वो होमवर्क पढ़ाई में जरा भी मजा नहीं आता नफरत होती थी। रोज टीचर उसे जाते ही स्कूल में होमवर्क नहीं कर ने की वजह से पूरा दिन खड़ा रखती थी। धीरे धीरे उसने घर में भी मम्मी पापा को बताना ही छोड़ दिया। पर एक दिन टीचर का पापा को फोन आ गया कि आप आकर मिले। रूमा ने कोई गौर नहीं किया। ठीक है देखा जाएगा। सोच कर बैठी थी। लेकिन पापा परेशान हो गए की स्कूल में क्यों बुलाया होगा। रूमा को बुलाया प्यार से पूछा तो समझ गए। उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा। पांच दिन बाद टीचर से मिलना था। उतने दिन रूमा ने सोच समझ कर होमवर्क पढ़ाई थोड़ी मेहनत कर ने में कोई कसर ना छोड़ी। अब टीचर को उसने समय पर सही सुंदर अक्षरों में करके दिखा दिया। टेस्ट में भी उसे सबसे अच्छे अंक मिले। अब टीचर हैरान थी कि जो सजा उसे देना थी उसके पापा को शिकायत करनी थी अब वह रूमा को साथ लेकर घूमने लगी उसे क्लास का मॉनिटर बना दिया था बहुत खुश रहती थी। पापा जब टीचर से मिलने पहुंचे तो हक्के-बक्के रह गए। उसे स्कूल में इतना प्यार सम्मान मिल रहा था टीचर ने अब उसे मॉनिटर कह कर उसे क्लास कंट्रोल की जिम्मेदारी दे दी थी। यह देख कर पापा बहुत खुश हो रहे थे। टीचर ने पूरी क्लास के सामने पुरस्कार दिया और कहा ऐसी होनहार स्टूडेंट है सभी को इससे प्रेरणा लेना चाहिए। पापा मम्मी खुशी से फूले नहीं समा रहे थे अब टीचर की लाडली बन गई थी। रूमा अब पापा मम्मी टीचर की चहेती बन चुकी थी। – जया भराड़े बड़ोदकर, टाटा सीरिन, ठाणे, वेस्ट मुंबई

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