मनोरंजन

ग़ज़ल – रीता गुलाटी

कुछ दिल की आज यारा,अब  तुम हमे सुनाओ।

भीतर जमी है उलझन, उसको जरा मिटाओ।

 

ठंडी हवा चले अब, शिकवा नही करो तुम।

छोड़ो ये सारी उलझन,जी भर के मुस्कुराओ।

 

आओ कि हम बसाऐ,खुशियों का एक मेला।

हम सब मिले खुशी से,इस प्रेम को जताओ।

 

ऩज़रो के तीर देखो,हम पर चला रही हो।

पागल मुझे बनाती,बस अब न तुम सताओ।

 

अंजान मैं रही थी,बातों से यार तेरी।

ये दिल तुम्हें ही चाहे,ये सच भी मान जाओ

 

तड़पे हैं दिल बड़ा ही,सुनते नही हो मेरी।

आ पास अब तो मेरे,इस जिंदगी को पाओ।

 

माना तुम्हें है समझा,सच्चे हो दोस्त मेरे।

दुनिया की रीत समझो ये सच भी जान जाओ।

 

आँखो मे जो छिपी है वो प्यार की  है ताकत।

देखो,पिया हमारे अब कुछ न तुम छिपाओ।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़

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