फिर समय ने अँगड़ाई लेकर
मौसम का घूँघट खोला है।
पतझड़ के मुखड़े में छाई
मधुमय बसंत की बेला है।
हर डाल शर्म से झुकी हुई
यौवन के भार से दबी हुई,
कौमार्य का मधुर श्रृंगार किये
आई जहाँ प्यार अकेला है।
हर कली समेटे है पराग
भौरों ने छेड़ा प्रीति राग।
मधु चूम रहा होकर निशंक
यह मिलन निशा की बेला है
मदहोश हवायें बहती हैं
जो सात स्वरों में कहती हैं
साँसों से साँसों के संगम का
खेल अनोखा खेला है।।
-नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश