मनोरंजन

हीरा – अमित कुमार

जब शब्दों पर पहरा था,

जब सच कहना गुनाह था,

तब एक कलम उठी चुपचाप—

वह हीरा था, जो अनमोल था।

मिट्टी की गंध लिए बोली,

भोजपुरी में दर्द पिघलाया,

“काहे बनवलs अछूत हमके?”

ईश्वर से भी प्रश्न उठाया।

ना क्रोध की ज्वाला भड़की थी,

ना विष-वचन का शोर हुआ,

बस तर्कों की धीमी आँच में

अन्याय का चेहरा चित हुआ।

“खंभवा के फारि कें…” की गूँज

आज भी मन को झकझोरती है,

सदियों की सोई संवेदना

उन पंक्तियों से बोलती है।

वह स्वर नहीं था केवल कविता,

एक युग का परिवर्तन था,

दलित-विमर्श की पहली धड़कन,

संघर्षों का उद्घोषण था।

सरस्वती के पावन पृष्ठों पर

जब उनकी लेखनी उतरी,

हाशिये से उठकर मानवता

सम्मान की राह पर निकली।

हे युग-प्रवर्तक, शब्द-शिल्पी,

आपको शत-शत अभिनंदन,

जब तक न्याय की बात रहेगी,

गूँजेगा आपका ही वंदन।

समता के उस प्रथम सिपाही को

हम सबका कोटि प्रणाम—

हीरा डोम, तुम्हारी ज्योति रहे सदा

– अमित कुमार बिजनौरी, बिजनौर, उत्तर प्रदेश

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