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होलिकोत्सव नहीं, प्रह्लादोत्सव नाम हो – कालिका प्रसाद सेमवाल

neerajtime.com – भारतीय सनातन परंपरा में प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन होता है। होली का पर्व भी ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण अवसर है, परंतु समय के साथ उसके मूल भाव और संदेश पर पर्याप्त चिंतन नहीं किया गया। यदि हम होली की पौराणिक पृष्ठभूमि को समझें, तो यह स्पष्ट होता है कि यह पर्व होलिका के नाम से नहीं, बल्कि भक्तराज प्रह्लाद की भक्ति-विजय के स्मरण के लिए है। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम इसे होलिकोत्सव नहीं, बल्कि प्रह्लादोत्सव के रूप में मनाएँ।
होलिका एक राक्षसी प्रवृत्ति की स्त्री थी, जिसे अपने भाई हिरण्यकशिपु के अत्याचारों का समर्थन प्राप्त था। उसने अपने अहंकार और वरदान के दुरुपयोग से एक निष्पाप, हरिनाम में लीन बालक प्रह्लाद को अग्नि में भस्म करने का प्रयास किया। दूसरी ओर प्रह्लाद एक नन्हा बालक होते हुए भी अडिग श्रद्धा, अचल विश्वास और निष्कलंक भक्ति का प्रतीक था। अग्नि में बैठते समय उसके पास न कोई अस्त्र था, न कोई उपाय—था तो केवल भगवान नारायण पर पूर्ण समर्पण।
परिणाम सबके सामने है। अग्नि, जो विनाश का प्रतीक मानी जाती है, स्वयं भक्ति के आगे पराजित हो गई। होलिका भस्म हुई और प्रह्लाद अक्षुण्ण रहे। यह घटना केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक शाश्वत सत्य का उद्घोष है—
जहाँ भक्ति सत्य होती है, वहाँ ईश्वर स्वयं रक्षक बन जाते हैं।
यहाँ प्रश्न उठता है कि हम किसका उत्सव मना रहे हैं?
एक राक्षसी के नाम से पर्व मनाना तर्कसंगत है या उस भक्त के नाम से, जिसकी भक्ति ने ईश्वरीय हस्तक्षेप को संभव बनाया?
“होलिका दहन” का वास्तविक अर्थ राक्षसी प्रवृत्तियों—अहंकार, अत्याचार, असत्य और दंभ—के दहन से है, न कि किसी राक्षसी के महिमामंडन से। यदि हम पर्व का नाम ही होलिकोत्सव रखते हैं, तो अनजाने में हम नाम के स्तर पर उसी राक्षसी प्रवृत्ति को केंद्र में ला देते हैं, जबकि केंद्र में तो प्रह्लाद की भक्ति, साहस और सत्यनिष्ठा होनी चाहिए।
प्रह्लादोत्सव कहना केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का परिवर्तन है। यह बच्चों को यह सिखाता है कि शक्ति से नहीं, भक्ति से विजय मिलती है। यह समाज को यह स्मरण कराता है कि अत्याचार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, सत्य और विश्वास अंततः विजयी होते हैं। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि ईश्वर मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि उस हृदय में प्रकट होते हैं जहाँ निष्कपट भक्ति होती है।
आज जब पर्व केवल रंग, शोर और औपचारिकता तक सीमित होते जा रहे हैं, तब प्रह्लादोत्सव का विचार हमें मूल सनातन चेतना की ओर लौटने का अवसर देता है। यह पर्व आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और भक्ति-विजय का उत्सव बन सकता है।
अतः यह कहना सर्वथा उचित है कि— होलिका राक्षसी थी, प्रह्लाद भक्त थे। इसलिए हमें होलिकोत्सव नहीं, प्रह्लादोत्सव मनाना चाहिए—
क्योंकि पर्व उसी का होना चाहिए,
जो आदर्श है, जो प्रेरणा है, और जो सनातन मूल्यों का वाहक है।
– कालिका प्रसाद सेमवाल, मानस सदन, अपर बाजार, रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड

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