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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

सोच मेरी को गले अपने लगाया आपने।

जिंंदगी कैसे जिये,हम,ये बताया आपने।

 

मार डालेगी हमें तेरी उदासी एक दिन।

राज़ अपना क्यो भला हमसे छिपाया आपने।

 

खुशबुओं का था तू पेकर शाम महकी अब बड़ी।

बस तू आया जिंदगी मे, फिर हँसाया आपने।

 

दूसरों का दर्द अब यारा कहाँ समझे हो तुम।

आँख मे अब आँसुओं को भर रूलाया आपने।

 

जी रही बच्चों की खातिर, रात दिन मेहनत करी।

साथ मिलकर बालकों को तब सुलाया आपने।

 

दिल की गहराई से चाहूं, प्यार माँगू बस तेरा

फिर मुझे ही ए खुदाया क्यो भुलाया आपने।

 

याद आता बेवजह*ऋतु से तुम्हारा वो मिलन।

लेके बाँहो मे सजन झूला झुलाया आपने।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चंडीगढ़

 

 

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