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संघर्ष, चेतना और बदलाव की काव्य यात्रा हैं ” नया सवेरा ” – डॉ अमित कुमार बिजनौरी

neerajtimes.com – जालिम प्रसाद की पुस्तक “नया सवेरा” आधुनिक हिंदी कविता में संघर्ष, चेतना और सामाजिक परिवर्तन की एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरती है। यह संग्रह केवल भावनाओं का विस्तार नहीं, बल्कि एक ऐसी यात्रा है जो इतिहास के अंधेरों से होते हुए एक नए उजाले की ओर बढ़ती है। कवि समाज के उस हिस्से को सामने लाता है जिसे मुख्यधारा की भाषा, साहित्य और इतिहास अक्सर स्थान नहीं देते। उनकी कविताएँ हाशिये पर खड़े मनुष्यों की पीड़ा, उनके संघर्ष और उनके अदम्य साहस को शब्द देती हैं।

पुस्तक का मूल स्वर प्रतिरोध और उम्मीद का है। कवि बार-बार यह बताता है कि अन्याय चाहे जितना भी गहरा और पुराना क्यों न हो, उसके सामने खड़े होने की इच्छा ही नए सवेरे का निर्माण करती है। इस संग्रह में कई कविताएँ ऐसी हैं जो सीधे-सीधे सामाजिक ढाँचे पर उंगली रखती हैं। उदाहरण के लिए, “हार नहीं मानूँगा” कविता एक घोषणा-पत्र की तरह सामने आती है। जातिवादी दीवारों, अवसरों की बंद खिड़कियों और न्यायालयों में दिखाई देती असमानता के बावजूद कवि का संकल्प अडिग रहता है। यह कविता oppressed समुदायों के जीवट स्वभाव का उत्कृष्ट प्रतिनिधित्व करती है और पाठक में संघर्ष का नया उत्साह जगाती है।

इसी प्रकार “भारतीय इतिहास” कविता में कवि इतिहास-लेखन की एकतरफ़ा व्यवस्था को कठोरता से चुनौती देता है। वह पूछता है कि इतिहास आखिर किसका लिखा गया—राजाओं, विजेताओं, सत्ता-पक्ष का या उन लोगों का जो सदियों से शोषण और संघर्ष की राह पर चलाए गए? इस कविता में कवि इतिहास के खोखलेपन पर उंगली रखता है और बताता है कि marginalized समुदायों की पीड़ा कभी इतिहास में दर्ज ही नहीं की गई। उनकी आवाज़, उनके आँसू, उनका संघर्ष इतिहास के पन्नों में गुम कर दिए गए। यह कविता पाठक को अपनी सीख और समझ दोनों पर पुनर्विचार करने को मजबूर करती है।

“कालांतार” कविता समय, समाज और परिवर्तन की वास्तविकता को लेकर गहरी बेचैनी व्यक्त करती है। कवि पूछता है कि क्या सच में समाज बदल गया है या केवल बदलाव का आवरण ओढ़ लिया गया है? वर्तमान और कालांतार की तुलना करते हुए कवि यह दिखाता है कि जातिवाद, आर्थिक असमानता और सामाजिक विभाजन अब भी उतने ही मजबूत हैं। यह कविता बताती है कि अगर बदलाव होता, तो दुख और भेदभाव की परतें अब तक टूट चुकी होतीं।

पुस्तक की एक और महत्वपूर्ण कविता “हमारी आवाज़” है, जो जनता की दबाई हुई आवाज़ का प्रतीक बन जाती है। कवि इस बात की ओर संकेत करता है कि आज भी truth-tellers को दबाया जाता है, आम आदमी की आवाज़ को महत्व नहीं दिया जाता, और न्याय का तराजू अमीरों व ताकतवरों की ओर झुक जाता है। यह कविता समाज के उस कठोर सच को सामने रखती है जहाँ आवाज़ों को बाँटकर उन्हें कमज़ोर किया जाता है। कवि इस कविता के माध्यम से सामूहिक प्रतिरोध की आवश्यकता पर जोर देता है।

भाषा, शैली और अभिव्यक्ति की बात करें तो जालिम प्रसाद की कविताएँ सरल हैं, लेकिन उनकी सरलता के भीतर गहरी आग छुपी है। वे भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग नहीं करते, बल्कि सीधी, साफ और सधे हुए शब्दों से ऐसी चोट करते हैं जो पाठक को भीतर तक हिला देती है। उनकी भाषा में सजावट कम, पर सत्य का प्रभाव अत्यंत तीव्र है। यह पुस्तक पढ़ते हुए यह साफ़ महसूस होता है कि कवि अपनी पीड़ा नहीं लिख रहा—वह उस पूरे समुदाय की पीड़ा लिख रहा है जिसकी आवाज़ सदियों से दबाई गई है।

“नया सवेरा” का साहित्यिक महत्व बहुत गहरा है। यह दलित साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाती है, साथ ही आधुनिक समय की सामाजिक विडंबनाओं को भी पूरी ईमानदारी से सामने रखती है। यह संग्रह उन सभी लोगों के लिए आवश्यक है जो समाज को समझना चाहते हैं, जो बदलाव की इच्छा रखते हैं और जो साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सच बोलने का साहस मानते हैं।

समग्र रूप से इस पुस्तक का संदेश स्पष्ट है—दमन चाहे जितनी भी गहरी जड़ें जमा ले, संघर्ष रुकना नहीं चाहिए। कवि का विश्वास है कि नया सवेरा आएगा, और वह सवेरा न्याय, बराबरी और मानवता का होगा। यह पुस्तक पाठक के मन में अनेक प्रश्न छोड़ती है, लेकिन साथ ही एक दृढ़ आशा भी देती है। यही इसकी सबसे बड़ी विजय है। आ० जालिम प्रसाद को पुस्तक के लिए ढेरो ढेरो बधाइयां और आकाश भर दुआएँ ।
पुस्तक समीक्षा :- नया सवेरा (एकल कविता सग्रह)
पुस्तक रचयिता :- आ० जालिम प्रसाद
पुस्तक मूल्य :- २९९/००
प्रकाशन :-स्वतंत्र प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड दिल्ली
समीक्षक डॉ अमित कुमार बिजनौरी, कदराबाद खुर्द, स्योहारा, जिला बिजनौर, उत्तर प्रदेश

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