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मेरी कलम से  – रुचि मित्तल

आँचल में अपने ओढ लूँ दुनिया की हर ख़ुशी,

फिर भी न जाने आस ये टूटी हुई है क्यों।

 

हमको हमारी आँख में आँसू भले लगे,

उम्मीद थी कभी तो वो आकर गले लगे।

 

तुम से मेरी जिंदगी की हर सहर है,

साथ हो तुम तो सुहाना ये सफर है।

 

जितने जतन थे वो सभी करके दिखाए हैं,

फिर भी बहारे इस तरह रूठी हुई हैं क्यों।

 

ऐ खुदा मुझको बता क्या ये तेरा दस्तूर है,

क्यूँ निज़ामत में तेरी हर आदमी मजबूर है।

– रुचि मित्तल, झज्जर, हरियाणा

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