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जिंदगी है…..कट ही जाएगी – डॉ ओम प्रकाश मिश्र

neerajtimes.com – आकर्षक मुख्य पृष्ठ और उन पर प्रतीकात्मक चित्रकारी से सुशोभित डॉ. सुधीर श्रीवास्तव की स्वरचित काव्य-कृति “जिंदगी है कट ही जाएगी” एक अत्यंत प्रभावशाली रचना-धर्मिता का जीवंत दस्तावेज है, जो सामाजिक जीवन के संघर्षों, हर्ष उल्लास और अनेकानेक अनुभूतियों और अंतर्मन में उठने वाली भावनाओं को कविता के सहज धरातल पर पाठकों को पहुंचाने में सक्षम है। आरंभ में शुभकामनाएं आ. आदर्श कुमार बेरी और आ. हंसराज सिंह ‘हंस’ द्वारा दी गयी हैं। वैदिक प्रकाशन हरिद्वार द्वारा प्रकाशित है।
पुस्तक का समर्पण , अपने माता-पिता और परिवार जनों के प्रति कवि की आत्मीयता और सम्मान तथा श्रद्धा भाव को व्यंजित करता है।
पुस्तक की अनुक्रमणिका में 126 कविताएँ है और कुल पृष्ठ संख्या 199 दर्शायी गयी है, जिनमें विषयगत वैविध्य के दर्शन होते हैं। ये विषय सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक आदर्शों के विभिन्न पहलुओं को आत्मसात करते हैं।जीवन की अनेकानेक स्वानुभूत विषयों और भावों को मार्मिकता से अभिव्यक्ति के स्वर इन कविताओं में विद्यमान है। इनमें हर्ष विषाद सामाजिक एवं वैयक्तिक भावोद्गार हैं। जीवन की विविध परिस्थितियों में कवि के अंतर्मन की अभिव्यक्ति मुखरित हुई है। अभिव्यक्ति शैली में हास्य- व्यंग्य के साथ साथ स्वाभाविक सहजता और संवेदनशील दार्शनिकता का पुट है।
भाषा सरल और सुबोध होकर भी शैली की सहजता एवं व्यंग्य विनोदी स्वभाव पाठकों के मन पर गहरा प्रभाव डालने में सक्षम है।
पुस्तक में कवि ने अपने जीवन के अनुभवों और भावनाओं को शब्दों में पिरोया है, जो पाठकों को सोचने और महसूस करने के लिए प्रेरित करता है। कवि की भाषा सरल और सुबोध है, जो पाठकों को आसानी से समझ में आती है।

समीक्षात्मक दृष्टि – “जिंदगी है कट ही जाएगी” एक ऐसी पुस्तक है जो आपको जीवन के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए प्रेरित करती है। कवि ने अपने जीवन के अनुभवों और भावनाओं को शब्दों में पिरोया है, जो पाठकों को सोचने और महसूस करने के लिए प्रेरित करता है। पुस्तक की भाषा सरल और सुबोध है, जो पाठकों को आसानी से समझ में आती है।
यह पुस्तक हम आद्योपांत पढ़ते चले जाते हैं मन कहीं भी नहीं ऊबता ऐसा लगता है जैसे कवि हमसे सहज संवाद करता चल रहा हो। इस पुस्तक की यही विशेषता इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि हम सभी पाठकों को यह पुस्तक अंतरंगता प्रदान करती है और यही विशेषता कवि के करीब हमें खड़ा कर देती है। फिर ऐसा लगता है जैसे यह हमारे ही जीवन का एक अंश है।
निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि पुस्तक पठनीय, संग्रहणीय और सामाजिक सांस्कृतिक और नैतिक आदर्शों को संजोकर रखने के लिए पर्याप्त है। सभी पढ़ें तभी पुस्तक की सार्थकता है। सफलता की अशेष शुभकामनाएं।

पुस्तक समीक्षा, समीक्षक- डॉ ओम प्रकाश मिश्र ‘मधुब्रत’

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