मनोरंजन

हिंदी ग़ज़ल – मणि अग्रवाल

तेरा  कोई  प्रण  तो हो,

मन का संप्रेषण तो हो।

 

चल तेरी मैं हो जाऊँ,

तुझमें आकर्षण तो हो।

 

अहसासों के  रिश्ते का,

आख़िर नामकरण तो हो।

 

ख़ुद जिसको सौ बार पढूँ,

ऐसा संस्मरण तो हो।

 

इच्छाएँ  जो  पाली हैं,

उनका पेट भरण तो हो।

 

कहता है तू मंत्र जिसे,

उसका उच्चारण तो हो।

 

तूने जो अहसान किये,

उनका कुछ विवरण तो हो।

– मणि अग्रवाल “मणिका”

देहरादून उत्तराखंड

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