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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

मूर्ख की कही जुबान नही।

कोई भी करता ध्यान नही।

 

इतना भी दिल हैवान नही।

लगता अब  तू नादान नही।

 

रस भर देती माँ की बातें।

माँ जैसा निगेहबान नही।

 

रखता गुण भीतर वो कितने।

होती इससे पहचान नही।

 

अस्मत लूटे जो नारी की।

मिलता उसको सम्मान नही।

 

करना कर्म गुनाहों वाले।

मिलता उसे क्षमादान नही

 

कौन सुनेगा दर्द हमारा।

भीतर घुटना आसान नही।

 

दर्द न समझे जो पत्नी का।

सच्चा वो अब इंसान नही

 

यार जमाना कैसा आया।

मेहमानों का सम्मान नही।

– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़

 

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