मनोरंजन

श्रृंगार – ज्योत्सना जोशी

शून्य की अविश्रांत छाया

यामिनी का विकल ताके

तुम अंगुजित शोर में हो

या अपरिहार्य स्वप्न में

संवाद की एक डोर बांधें

कुछ अनिश्चित अनकहे हैं

कह रहा अंतराल मुझसे

खोज लो परिणाम अपना

मौन को स्वीकार कर लो

या माप लो निज भाव अपना

मन गीत अधरों का वही है

भीग रही है शशि किरण से

उस निशा का उत्सव समझो

पात पर बिछती तुषार

अवनि का अभिषेक करती

पीर धुलती अश्रु धारा

प्रिय प्रीत का श्रृंगार करती।

– ज्योत्सना जोशी , देहरादून , उत्तराखंड

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