गरीबो को चले बाँटे पटाखे आखिर दिवाली है।
हँसी चेहरे पे आ जाए हँसे आखिर दिवाली है।।
मुहब्बत को सदा बाँटे सुने आखिर दिवाली है।
करे पूजा महालक्ष्मी रटे आखिर दिवाली है।
अमावस के अँधेरे को मिटा देगें दिवाली मे।
उजालो का सफ़र आगे बढ़े आखिर दिवाली है।
खुला है दर रफाकत का असासा भी उठाओगे।
करे पूजा भवन माँ के चले,आखिर दिवाली है।
हमारी चाह है तुमसे कहे हर बात दिल की अब।
मिलें चाहत स़ज़न हमको सुने आखिर दिवाली है।
बना है साथ अब कुंदन, मिले हमको सदा तू ही।
खुशी मिलकर मनायेगे रूके आखिर दिवाली है।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़