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*सास का ब्रत* (लघु कहानी) – श्याम कुंवर भारती

neerajtimes.com – दिवाली आने वाली थी । गायत्री और उसका पति आलोक दोनों मिलकर घर की साफ सफाई में लगे हुए थे । पैसा बचाने के लिए दोनों खुद ही अपने घर की दीवारों पर रंग रोपण कर रहे थे। गायत्री सीढ़ियों पर चढ़कर  ब्रश से पेंट लगा रही थी ।तभी उसका पैर सीढ़ियों से फिसल गया । वो जोर से चिल्लाई । आलोक वही नीचे पेंटिंग का सारा सामान तैयार कर रहा था और गायत्री की मदद कर रहा । अपनी पत्नी की चीख सुनकर वो ऊपर देखा और जब तक वो गायत्री को पकड़ता वो धड़ाम से पैरों के बल जमीन पर गिर पड़ी और उसका पैर मूचक गया। वो दर्द से चिल्लाने लगी। आलोक ने उस किसी तरह उठाकर सोफे पर बैठाया।

आलोक उसे तुरंत अस्पताल ले गया। डॉ ने तुरंग उसके पैर का एक्सरे किया पता चला उसके पैर की हड्डी चटक गई है। उसका प्लास्टर करना पड़ेगा।

आलोक ने उसका प्लास्टर करवाया और दवा लेकर घर आ गया।

जैसे ही वो घर आया उसने देखा उसके माता और पिता गांव से आए थे और दरवाजे पर उनका इंतजार कर रहे थे।

आलोक सबको घर में ले आया। अपनी बहू की हालत देखकर आलोक की मां बहुत चिंतित हुई और बोली मै सोचकर यहां आई थी कि छठ पूजा करूंगी और मेरी बहु मेरी सहायता करेगी लेकिन इसकी हालत देखकर तो ऐसा नहीं लगता ये मेरी कुछ मदद कर पाएगी। छठ पूजा बिना किसी के सहायता से, करना मुश्किल है।

आलोक के पिता ने दोनों को डांटते हुए कहा,  घर में पैसे की कमी है क्या जो खुद ही घर कि पेंटिंग-डेटिंग में लगे हुए थे। दो चार मजदूर लगा देते  बहु की ऐसी हालत न होती । कल से चार मजदूर ले आओ और काम पर लगा दो। मजदूरी मै दे दूंगा।

नहीं पापा आप क्यों पैसा खर्च करेंगे । मैं कमजदूर लगवा देता हूं ।

दो दिनों में घर का रंग रोपण मजदूरों ने कर दिया । घर बड़ा सुंदर लगने लगा था। उसकी मां ने टूटे फूटे और पुराने सामान कबाड़ी वाले को बेच दिया । जो काम लायक समान थे उन्हें आलोक से बोलकर मरम्मत करवा दिया।

उसकी मां ने बताया टूटे फूटे और पुराने सामान बेकार में घर में नहीं रखना चाहिए । इससे बुरा प्रभाव घर में पड़ता है। इन्हें या तो हटा दो या जो काम लायक हो उनकी मरम्मत करवा कर उपयोग में ले आओ।

दिवाली बड़ी धूमधाम बीत गई । गायत्री अपने प्लास्टर पड़े पैर को लेकर सोफे पर बैठे-बैठे सब देखती रही थी। घर का सारा काम उसकी सास को करना पड़ रहा था ।

उसके दोनों बच्चे अभिषेक और शिखा दिवाली में फुलझड़ी जलाने और पटाखे फोड़ने में मजा ले रहे थे।

घर में लक्ष्मी मां की पूजा पाठ भी गायत्री की सास ने ही किया।

एक दिन गायत्री की सास की तेज बुखार आ गया उसने बेड पकड़ लिया। आलोक ने डॉ को बुलाकर अपनी मां को दिखाया । डॉ ने दवा देने के बाद बताया कल खाली पेट में खून और पेशाब की जांच करनी होगी । अगले दिन सब जांच होने के बाद पता चलेगा आपकी मां को क्या हुआ है। दूसरे दिन जांच के बाद पता चला उसकी मां को टाइफाइड फीवर (बेमियादी बुखार) हो गया है। बुखार ठीक होने में एक दो सप्ताह लग सकता है। दवा खिलाते रहना है।

उसकी मां चिंता कर रही थी । उसकी बहु अपना पैर लेकर पड़ गई है। उसे खुद बेमियादी बुखार हो गया है। दोनों पोता और पोती नौकरी करते हैं अब छठ का व्रत कौन करेगा ।

उसने अपने बेटे आलोक को बुलाकर उसने कहा, बेटा मै हर साल छठ ब्रत  करती आ रही हूं , लेकिन इस बार अब कौन करेगा । तेरी बहन को भी नहीं बुला सकती वो खुद अपनी ससुराल में छठ कर रही है।

मां तुम चिंता मत करो मैं अभी अपने गुरु जी बाबा बांके बिहारी जी से बात कर पूछता हूं कि ऐसी हालत में क्या करना चाहिए।

बाबा बांके बिहारी ने बताया हालांकि छठ मुख्यतः व्रत करती है,  लेकिन विषम परिस्थिति में पुरुष भी कर सकता है। तुम अपनी मां के बेटे हो तो तुम इस व्रत को कर सकते हो ।

उसकी मां ने कहा बेटा ये तो मैने सोचा ही नहीं । इस बार तुम इस व्रत को उठा लो । तुम्हारी बेटी को बोलो दो तीन दिन की छुट्टी ले ले ।

छठ व्रत आने पर आलोक ने पूरी श्रद्धा और नियम से छठ व्रत किया।

– श्याम कुंवर भारती , बोकारो, झारखंड, मॉब.9955509286

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