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“मोह सदैव दु:ख देता है” – डा. अंजु लता

 

अपनों से अपनत्व रखें हम, संस्कार यही कहते हैं-

मोह-माया के मोहक धागे,इसीलिये बांधे रखते हैं,

राजा हो गया रंक कोई ,जीव-जंतु,पशु-पाखी-

जुड़े परस्पर इसी मोह से जब तक सांसे हैं बाकी.

 

मानव-मन में रिश्ते-नाते,अहम भूमिका अदा करें-

ठोकर लगे न संभलें फिर भी,अपनों पर ही सदा मरें,

कहते हैं अपने ही मारें, द्वेष-जलन की तेज कटार-

गहरे घाव करें मानस पर,कटु शब्दों से करें प्रहार.

 

मोह रखें मां-बाप हमेशा अपनी ही संतानों से-

अश्रु बहाते,अपमानित होते जब उनके तानों से,

मोह का पर्दा आंखों पर रहकर अंधा कर देता है-

अपनों से धोखा खाकर मन जार-जार रो लेता है.

 

‘अति से अमृत विष बनता है’ सोलह आने बात सही है-

अधिक मोह दु:ख ही देता है,रीत जगत की यही रही है.

फिर भी निर्मोही बन जाना,दृढ़ विश्वासी की है पहचान-

निराकार से लगन लगाकर,पाओ उचित मान सम्मान.

-डा. अंजु लता सिंह गहलौत,  नई दिल्ली

 

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