मनोरंजन

ख़त अपने नाम – सविता सिंह

आज एक खयाल आया
और दिल को यूँ भा गया,
कि हम अक्सर दूसरों की नज़रों में
अपनी क़ीमत ढूँढ़ते हैं,
उनके आँकलन में संतुष्ट हो जाते हैं।
पर क्यों न आज वही लिखा जाए
जो हम स्वयं से सुनना चाहते हैं
क्यों न एक ख़त लिखा जाए खुद को।
क्यों दूँ किसी और को अधिकार
कि वह मेरे वजूद का मूल्य तय करे?
सो मैंने कलम उठाई
और लिख डाला एक ख़त अपने ही नाम।
तुझे पता है,
तेरे बिना ज़िन्दगी की सारी रौनकें
फीकी पड़ जाती हैं।
तू तो जैसे इठलाती, बलखाती
रंग-बिरंगी तितली
जहाँ ठहर जाए, वहाँ खुशबू भर जाए।
याद है बचपन में,
जब बारिश होती थी,
हम पत्थर और कपड़ों से
एक छोटा सा तालाब बनाते थे
फिर उसमें अंजुरी भर-भर पानी उछालते,
छपाछप खेलते,
और तू खिलखिलाकर हँस पड़ती थी।
और वो बर्फ का गोला!
बिना चप्पल के भागती चली जाती थी
अंकल जी, ऑरेंज रंग डाला है न
पीला भी डाल दीजिए ना!”
फिर चुक्कड़ में लेकर
सुर्र-सुर्र आवाज़ करते हुए खाना
क्या जमाना था वो!
आज,
हम घर की भाग-दौड़ में खोकर
स्वयं को सजाना-संवारना भूल गए हैं।
दूसरों की तारीफ़ सुनकर ही खुश हो जाते हैं,
मानो उनका शब्दकोश ही
हमारी पहचान हो।
लेकिन आज
मैंने ख़ुद को आज़ाद कर लिया
उन सीमाओं से,
उन परिभाषाओं से।
आज जब मैंने खुद को
खुद से मिलवाया,
तो लगा जैसे
पुनः वह ख़िताब
मेरे ही नाम आया।
तो सुनो
तुम भी लिखो एक ख़त अपने नाम।
खुद से मिलो, खुद को पहचानो।
क्यों इंतज़ार करो
कि कोई और कहे तुम ख़ूबसूरत हो
जब तुम ख़ुद कह सकती हो,
और मान भी सकती हो।
– सविता सिंह मीरा
झारखंड, जमशेदपुर

Related posts

जज्बात सलामत रहने दो – मधु शुक्ला

newsadmin

लहराओ तिरंगा हर घर – गुरुदीन वर्मा

newsadmin

जन्मदिन की शुभकामनाएं – ममता जोशी

newsadmin

Leave a Comment