मनोरंजन

शब – रुचि मित्तल

 

अब शब की चुप्पियों में

ढल रही है ये ज़िंदगी

कभी सूरज थी जो

अब इक दीया सी

जल रही है ज़िंदगी।

 

न कोई शोर

न कोई ख़्वाब

न कोई भी तमन्ना

बस यादों की चादर

ओढ़कर चल रही है ज़िंदगी।

 

कभी क़दमों में जहां था

कभी आँखों में सफ़र

अब अपनी ही परछाईं से

ड़र रही है ज़िंदगी।

 

जिन्हें अपना कहा वो भी

वक़्त के साथ बह गए

अब अपनों की तरह ग़ैरों से

मिल रही है ज़िंदगी।

 

मगर फिर भी शिकायत का

नहीं कोई वजूद

हर चोट को मुस्कुराकर

निगल रही है ज़िंदगी।

 

मुझसे ये मत पूछिए

अब कैसी है शाम-ए-हयात

हर रोज़ इक सलीब पे

पल-पल पिघल रही है ज़िंदगी।

©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा

 

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