मनोरंजन

उम्मीद – रश्मि मृदुलिका

एक दीप दिल में जल रहा है|

फिर एक ख्वाब पल रहा है|

तारों ने थककर आंखें मूंद ली‌ है

निशा में कौन‌ जुगनूं जग रहा है|

अश्रु गिरे दामन में बेबसी से,

बेशर्म शंख ( पत्थर)किस पर हंस रहा है|

किस खुशफहमी में हो जानां मेरे,

वक्त से दिल ए जख्म भर रहा है|

वादें भूल जाना इसांनी फितरते है|

उस पर शराफ़ते परस्ती खल रहा है|

अंधेरा वहम का साफ हो रहा है|

धीमे से सही उजाला छन रहा है|

बेबस इंसान इंसानियत ढूंढ रहा है|

दर्द से किसका सीना जल रहा है|

अंधेरी रातें जी डरा नहीं सकती,

मेरा आकाश तारों से सज रहा है|

-रश्मि मृदुलिका, देहरादून, उत्तराखंड

 

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