मैंने देखा है,
उन पत्तों को,
जो आंधी में कांपते हैं,
जिनकी जड़ें मिट्टी में हैं,
पर मन खुली हवा का सपना देखता है।
मैंने सुना है,
उस चिड़िया की पुकार,
जो अपने घोंसले से दूर,
किसी और के आंगन में
अपना बसेरा ढूंढती है।
मैंने महसूस किया है,
उन लहरों की बेचैनी,
जो सागर के सीने से उठती हैं,
पर किनारे की कैद में तड़पती हैं।
मेरे मन का हर कोना,
बस इन्हीं बंधनों में उलझा,
पिंजरों से टकराता,
खुद को आज़ाद करने की चाह में,
हर रोज़ एक नई मौत मरता है।
– प्रियंका सौरभ, 333, परी वाटिका,
कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी)
भिवानी, हरियाणा – 127045,