राष्ट्रीय

स्वतंत्र नहीं, स्वच्छंद हैं हम (व्यंग्य) – सुधाकर आशावादी

neerajtimes.com – स्वतंत्रता हर किसी को रास नही आती। खासकर आम आदमी को। जिसे देखो वही आम आदमी का नाम लेकर ख़ास आदमी बनने की फ़िराक़ में रहता है। कहने को तो अपना तंत्र है लेकिन अनुशासन भी जरूरी होता है। अनुशासन को बंधन समझने वाले भला अनुशासन में कैसे रहें, पराधीन सपनेहुँ सुख नाहिं तो यह समझते हैं, मगर स्वतंत्रता का अर्थ समझने की ज़हमत ये नहीं उठाते। तनिक सा मुफ्त का चुग्गा इनके सामने डाल दो, तो ये उस चुग्गे पर अपने सर्वाधिकार सुरक्षित समझ बैठते हैं। अपने एक मित्र है, स्वयं को बड़ा क्रांतिकारी सिद्ध करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते। उनकी ज़ुबान पर हमेशा गरीब,मजदूर, वंचित शोषित जैसे शब्द चढ़े रहते हैं, मगर उनके कपड़ों में सफेदी की झंकार बार बार लगातार मजदूरों की मेहरबानी से आती है। वह व्यवस्था को गालियां भी खूब देते हैं, मगर अपनी आय के स्रोत कभी उजागर नही करते। देश का हाल कुछ ऐसा ही है, मजदूर कभी अमीर नहीं होते, किन्तु उनका नाम लेकर उनके नाम पर दुकानदारी करने वालों की आय दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती है। कभी नौकरी के बदले जमीन लेने के घोटाले उजागर होते हैं, कभी बिना जेब से पैसा खर्च किये करोड़ों के मुनाफे कमाए जाते हैं। बहरहाल व्यवस्था ही कुछ ऐसी है। साइकिल की सवारी करने वाला कब प्राइवेट वायुयान से आसमान में विचरण करने लगे, इसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। वैसे भी कब किसका भाग्य बदल जाए, यह कोई नहीं जानता। सर्वेंट क्वार्टर में रहकर जनसंख्या वृद्धि में अतुलनीय योगदान देने वाले कब अपने नकारा बच्चों को करोड़पति बना दें, कुछ कहा नहीं जा सकता। लोकतन्त्र का सत्य भी यही है, खानदानी दुकानें चल रही हैं, फ्यूज बल्बों को इकट्ठा करके मार्केटिंग की जा रही है। चुके हुए कारतूसों को प्रयोग करने का प्रयास किया जा रहा है।
नैतिकता, ईमानदारी जैसे शब्द राजनीति के शब्दकोश से गायब हो चुके हैं। चोरी और सीनाजोरी जैसे मुहावरों ने बेशर्मी से राजनीति में अपना स्थान पक्का कर लिया है। चोर को चोर कहना ही गुनाह हो गया है। यही तो स्वच्छंदता है, जो लोकतंत्र ने जनमानस को सौंप दी है। अब सार्वजनिक क्षेत्र में नजर डालें, तो बदला हुआ नज़ारा नजर आता है। सड़कें पैदल चलने के लिए हैं या पीकदान हैं, समझा नहीं जा सकता। राह चलते कब कौन आपके सामने अपने मुँह की गंदगी बीच सड़क पर उगल दे, समझना मुश्किल है। कब कौन बड़ी हवेली में संभ्रांत लोगों के बीच बैठकर अपनी एक आँख दबा दे, कब किसके गले पड़ने का नाटक करे, कब अपनी माता बहिनों सम महिलाओं के सम्मुख कुछ उछाल दे, इसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। करना कुछ नहीं है, केवल चलती हुई गाड़ी के सम्मुख अवरोध उत्पन्न करने में महारत हासिल करने की जिद पूरी करनी है। जिन्हें अपना इतिहास मालूम नहीं, वे देश का भूगोल बदलने की बात करते हैं। जो विदेशों में जाकर रुदन करते हैं, कि उनके मुँह पर टेप चिपका कर उनके बोलने पर पाबंदी लगाई जाती है। वही हर किसी को गालियां देने के लिए स्वच्छंद हैं। अपने गिरेवां में झाँकने की जगह हर कोई पड़ोसी की थाली पर नजर गड़ाए बैठा है। राष्ट्र द्रोही हरकत करने पर भी उसे लज्जा नहीं आती। कहने को हम अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर इतराने में माहिर हैं,मगर विषवमन जारी है। कार्यपालिका स्वयं को देश के संविधान और न्यायपालिका से भी बड़ा समझती है, सो मनमुताबिक आचरण करती है। नकारात्मक चुके हुए लोग रतौंधी के शिकार हो चुके हैं, उन्हें विकास कार्य नजर ही नही आते, सबका साथ सबका विकास उन्हें केवल जुमला प्रतीत होता है, उन्हें मुफ्त राशन, मुफ्त की योजनाओं से दुर्बलों को दी जाने वाली सुविधाएं दिखती ही नही। उन्हें अपने घर में होने वाले अत्याचारों से कोई सरोकार नही है। भले ही पैरों तले से धरती खिसकती जा रही हो, मगर वे पुरानी दुकानों की लिपाई पुताई करवा के नए नाम से शोरूम खोलने में जुटे हैं। वे जानते हैं, कि लोकतंत्र में अपनी अपनी दुकानों को अकेले चलाना मुश्किल है, मिल बाँट कर खाने में ही भलाई है। कमाई के लिए मौसेरे भाई एकजुट रहकर अपने अस्तित्व की रक्षा भी कर सकते हैं और धंधे को बढ़ा भी सकते हैं। न्याय व्यवस्था के लंबित न्याय से उनको राहत मिल रही है और मिलती रहेगी। इस सत्य वे अवगत हैं, तभी तो उनकी स्वच्छंदता बदस्तूर जारी है। (विनायक फीचर्स)

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