दीप की लौ है अधूरी तम उसे भरमा रहा है ।
सूर्य के हस्ताक्षरों पर धुंध कुहरा छा रहा है ।
द्रोपदी का चीर खिंचता द्रोपदी के राज में ही ,
भारती का वक्ष घायल है बहुत अकुला रहा है ।
हर सुबह तेज़ाब डूबी रक्त रंजित शाम देखो ,
सुर्ख़ हैं अख़बार सारे कौन ये छपवा रहा है ।
मृत्यु के आलेख अंकित देखिए सब चैनलों पर,
बागवां अपने चमन के फूल तोड़े जा रहा है ।
देवता मूर्छित हुए हैं मूक है सब प्रार्थनाएं ,
शोकपत्रों पर विजय के गीत कोई गा रहा है ।
किस समय में जी रहे हम कौन है इसका रचियता ,
कौन अक्षत थाल वाले पुष्प को ठुकरा रहा है ।
लोग अंधे हो रहे हैं मज़हबी चश्मा पहनकर ,
भाषणों से कौन सारी कौम को भड़का रहा है ।
अब यहां माधव नहीं जो शांति का पैगाम लाये ,
मज़हबी चोला पहन आतंक संसद आ रहा है ।
नागरिक समता हमारे राष्ट्र का आधार होवे ,
देश “हलधर” के सुझावों को नहीं अपना रहा है ।।
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून