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बच के रहना –  अनिरुद्ध कुमार

 

सर्प सरीखा ना कुछ दूजा।

सर्पों का संसार अजूबा।।

डरता इससे, सारा सूबा।

डंडा ले दिखलाता कूबा।।

 

सर्प फिरें होके मतवाला।

लाल हरा तो कोई काला।।

सर्प सदा रेंगें बलखाये।

क्रोधित होके फन दिखलाये।।

 

सर्प लगे सब सीधा सादा।

आहट पाके झट छिप जाता।।

चूहा, मेडक ,कीड़ा खाता।

दूध मधुर इसको है भाता।।

 

तरह तरह के सर्प हैं होतें।

दादी कहती जागे सोते।।

खेती को आसान बनायें।

कीड़ा मारें फसल बचायें।।

 

नाग डराये, फन दिखलाये।

धामिन सरपट दौड़ लगाये।

अजगर मोटा काया भारी।

सर्प हरा दुबला तन धारी।।

 

सर्पों को भी जीवन प्यारा।

सीधा सादा निश्छल सारा।।

सर्पों का विष है हितकारी।

दूर करें गंभीर बिमारी।।

 

सर्पों पर है कथा कहानी।

साँप सपेरा याद जुबानी।।

सापों से सोंचो क्या डरना।

सर्पों से बस बचके रहना।।

– अनिरुद्ध कुमार सिंह

धनबाद, झारखंड

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